Dar

## 2009 में लिखी गयी एक metaphysical creativity — कमबख्त  डर डर चीज़ है ही ऐसी … एक बार जो लग जाये कर जाये ऐसी की तैसी ……. मृत्यु को ही अंतिम सच माना गया है। सारी बातें टल सकती है पर मृत्यु नहीं ….। परन्तु अब मैं … मानता हूँ की  डर … डर ही है अंतिम सत्य। मृत्यु को भी अंतिम सत्य मानने का कारण ये डर ही है। मृत्यु भी डर का ही एक रूप है। अभी तक मृत्यु को अंतिम सत्य मानने का कारण ये था की “डर ”…

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Nayi Rah

“आइये आइये ! अरे आइये  आइये  … IIT का नुक्कड़ देखिये “ बहुत जोर से चिल्लाता हूँ मैं| चिल्लाता हूँ ताकि सारे लोग सुने| सारे लोग जाने, सभी आये और देखे खुद को आईने में| देखे कि वो अब तक कैसी जिन्दगी जीते आ रहे है, किस बदलाव की जरुरत है, किस ओर कदम बढ़ाना चाहिए और कहाँ ठिठक जाना चाहिए| इसीलिए जोर से चिल्लाता हूँ| ज़ोर से चिल्लाता हूँ क्यूंकि अब लगता है लोग थोड़े बहरे हो गए हैं, या तो लोगों ने बहुत ज्यादा बोलना शुरू कर दिया…

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Bhavna

हर नुक्कड़ पे उसे खोजता हूँ हर गली , मौहल्ले बाग़ बगीचे … खंडहरों तक में  खोजता हूँ उसे अब तो चार दिवारी के अन्दर भी  मुलाकात नही होती   पहले लगता था की ये बाजारों में बिकता है भाव लगाये जाते है ,  महलो में सजावट के लिए प्रयोग में लाये जाते है.   इसीलिए घरो में खोजता था … अपनों में खोजता था … दोस्तों में खोजता था … भावना की क़द्र करता था भावो पे ही दिन रात मरता था बस चाहत थी प्यार से  एक मुस्कान…

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